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VOL. 2, ISSUE 4 (2017)
सरस्वती सदृश विलुप्त होती गंगा: एक मंथन
Authors
डाॅ0 देवेन्द्र प्रताप मिश्र
Abstract
भारतीय संस्कृति के स्पन्दन में गंगा की भूमिका अप्रतिम है। इस प्रसंग में सर मार्टिमर व्हीलर की यह उक्ति अत्यन्त समीचीन है कि यदि सिंधु नदी ने इस देश को सभ्यता दिया तो गंगा ने इसे आस्था प्रदान की। भारत की सांस्कृतिक सरिता के प्रवाह में गंगाघाटी की उर्वरा भूमि की केन्द्रीय भूमिका रही है। गंगा की उपत्यका में स्थित समूचे उत्तर भारत को विभिन्न भौगोलिक इकाइयों में विभक्त किया गया है, यथा- उच्च गंगाघाटी, मध्य गंगाघाटी व निम्न गंगाघाटी। यह भू-भाग विभिन्न सरिताओं एवं उपसरिताओं से सतत् प्रवाहमान एवं अभिसिंचित है। गंगा के अतिरिक्त यमुना, घाघरा, कोसी, गोमती, सई, इत्यादि नदियों ने यहाँ की भूमि को उर्वरा प्रदान की है। यहाँ की शस्यस्यामला उर्वरा भूमि, जलवायु एवं पर्यावरण मानव के अधिवास हेतु अत्यन्त अनुकूल रहा है और इसी से आकर्षित होकर मानव इस क्षेत्र में आबाद होने के लिए बाध्य हुआ।
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Pages:706-708
How to cite this article:
डाॅ0 देवेन्द्र प्रताप मिश्र "सरस्वती सदृश विलुप्त होती गंगा: एक मंथन". International Journal of Academic Research and Development, Vol 2, Issue 4, 2017, Pages 706-708
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