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VOL. 2, ISSUE 5 (2017)
भारतीय समाज में आरक्षण का राजनीतिकरण (एक विश्लेषण)
Authors
डाॅ. नरेन्द्र सीमतवाल, गौरव सिंघल
Abstract
स्ंविधान निर्माताओं ने भारतीय समाज के इतिहास की समझ तथा स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विकसित राष्ट्रीय आदर्शों एवं लक्ष्यों के आलोक में शताब्दियों से चले आ रहे अन्याय के प्रतिकार ने नैतिक आग्रह का सम्मान करते हुऐ अनेक संवैधानिक उपायों को न केवल विधिक मान्यता प्रदान की बल्कि इनके क्रियान्वयन का भी प्रयास किया। दलितों वंचितों या पिछडों को अगडो के साथ खडे हो सकने में समर्थ बनाने की दृष्टि से एक ओर जहाॅं छुआछूत और जातीय भेदभाव को दूर करने के लिए संवैधानिकक व्यवस्था की, वहीं दूसरी ओर आरक्षण का प्रावधान भी किया। मुठ्ठी भर लोग उपर उठते गए पर सामाजिक चेतना के विकास अथवा लाभों की दृष्टि से कोई बुनियादी अन्तर नहीं आया। असल में आरक्षण को सैद्धान्तिक आधार देने के स्थान पर जातीय आधार मानकर राजनीतिक सकीर्ण स्वार्थों को इससे जोड़ दिया गया और वोट-बैंक की राजनीति का हिस्सा बना दिया गया। परिणामतः कोई ठोस बदलाव संभव नहीं हुआ और डाॅं. अम्बेडकर का सपना अधूरा ही रह गया।
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Pages:1117-1120
How to cite this article:
डाॅ. नरेन्द्र सीमतवाल, गौरव सिंघल "भारतीय समाज में आरक्षण का राजनीतिकरण (एक विश्लेषण)". International Journal of Academic Research and Development, Vol 2, Issue 5, 2017, Pages 1117-1120
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